ॐ नमो गंगाये विश्वरूपीणी नारायणी नमो नमः।।
ॐ गंगे मातर्न्मस्मरामी सततं त्वन्मूरतीमत्य्भुताम, देवी देवत दुर्लभंयमुनाया वाचान सम्पूर्णया, भक्तेनाथ भगीरथे न भगवत पादेश्चपादार्चके,र्या नित्यं समुपाश्रिता विजयते गंगोत्तरी सद्मिनिम..
नमामि गंगे तव पाद पंकजम्, सुरासुरैः वंदित दिव्य रूपम् । भुक्तिं च मुक्तिं च ददासि नित्यं, भावानुसारेण सदा नराणाम् ॥
प्रिय श्रद्धालुगण,
जय माँ गंगे!
माँ भगवती गंगे के दिब्य और पावन धाम श्री गंगोत्री में श्री 5 मन्दिर समिति, गंगोत्री धाम, हिमालय आपका हार्दिक स्वागत, वन्दन और अभिनन्दन करती है|
माँ गंगा की यह पवित्र धारा अपने में अलोकिक तेज को संजोये अनादिकाल से लोक कल्याण की भावना से शतत रूप से प्रवाहित हो रही है। गंगोत्री धाम वह पावन स्थल है, जहाँ माँ गंगा राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर पृथ्वी पर अवतरित हुयी थी । यह स्थान आत्मिक शुद्धि, मोक्ष और पुण्य का द्वार है। गंगोत्री केवल एक तीर्थ नहीं, आत्मा की यात्रा का आरंभ है। यहाँ दर्शन मात्र से पापों का क्षय होता है, और मन को दिव्यता प्राप्त होती है। यह चार धाम यात्रा का प्रमुख हिस्सा है, और वैदिक परंपरा का आधार है। गंगा जी के दर्शन से मन और आत्मा दोनों शुद्ध होते हैं। यह स्थान केवल तीर्थ नहीं, बल्कि पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति दिलाने वाला मोक्ष का द्वार है।
निवेदक- श्री 5 मन्दिर समिति, गंगोत्री धाम, हिमालय
दिव्य धाम श्री गंगोत्री का इतिहास, उत्तराखंड - Read More
गंगोत्री मंदिर भारत के सबसे पवित्र हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक है। यह उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में, विशाल हिमालय में लगभग 3,100 मीटर (10,200 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर पवित्र गंगा नदी की देवी, माँ गंगा को समर्पित है। गंगोत्री,, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के साथ उत्तराखंड के प्रसिद्ध चार धाम यात्रा का हिस्सा है।
पौराणिक महत्व
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, राजा भागीरथ ने देवी गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनके पूर्वजों को श्राप मिला था और केवल गंगा के पवित्र जल से ही उनकी आत्माओं को मुक्ति मिल सकती थी।
जब देवी गंगा पृथ्वी पर आने के लिए सहमत हुईं, तो भगवान शिव ने पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए उनके शक्तिशाली प्रवाह को अपनी जटाओं में समा लिया। उनकी जटाओं से नदी धीरे-धीरे हिमालय में बहने लगी। गंगोत्री में पवित्र पत्थर उस स्थान को चिह्नित करता है जहाँ माना जाता है कि गंगा ने पहली बार पृथ्वी को छुआ था भागीरथ के प्रयासों से माँ गंगे के अवतरण के कारण गंगा नदी को भागीरथी के नाम से भी जाना जाता है.
मंदिर निर्माण का इतिहास
16वीं सदी से इस स्थान पर मंदिर होने के स्पस्ट प्रमाण उपलब्ध हैं. वर्तमान गंगोत्री मंदिर का निर्माण 18वीं सदी की शुरुआत में गोरखा जनरल अमर सिंह थापा ने करवाया था। इसे पारंपरिक हिमालयी मंदिर वास्तुकला में सुंदर सफेद ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया था।
यह मंदिर सरल लेकिन राजसी है, जिसमें पिरामिडनुमा छत और एक गर्भगृह है जिसमें देवी गंगा की चांदी की प्रमुख मूर्ति के साथ- साथ भागीरथ महाराज, माँ यमुना , माँ लक्ष्मी , हिमालय राज , माँ दुर्गा , गणपति , स्थानीय इष्ट देव समेश्वर महाराज आदि की मूर्तियाँ और निसान स्थापित है।
धार्मिक महत्व
गंगोत्री न केवल पूजा का स्थान है, बल्कि एक शक्तिशाली आध्यात्मिक केंद्र भी है। लाखों भक्तों का मानना है कि यहाँ के पवित्र जल में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं और मोक्ष (मुक्ति) मिलती है।
आस-पास के महत्वपूर्ण पवित्र स्थानों में शामिल हैं:
भागीरथ शिला– जहाँ राजा भागीरथ ने तपस्या की थी और माँ गंगा अवतरित हुयी थी.
मंदिर परिसर – मुख्य मंदिर के अलावा बाबा भैरव का धुना , गौरी-शंकर मंदिर , हनुमान मंदिर, गणेश मंदिर, लक्ष्मी-दुर्गा और काली मंदिर प्रमुख हें.
सूर्यकुंड – यहाँ पर माँ गंगा अपने वेग के साथ एक प्रपात के रूप में तीव्र वेग से कुंड में समाती हुयी प्रतीत होती है .
पांडव गुफा– महाभारत के पांडवों से जुड़ी हुई है समीप ही पटांगणा नामक दर्शनीय स्थल भी है.
भैरव घाटी – स्थानीय कोतवाल के रूप में पूजित बाबा आनंद भैरव का मंदिर, कहते हें गंगोत्री की यात्रा इस मंदिर के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है.
गढ़तांग गली – तिब्बत और भारत के संगम पर गढ़तांग गढ़ का प्राचीन प्रवेश द्वार . वर्तमान में उत्तराखंड पर्यटन विभाग और वन विभाग द्वारा खूबसूरती से पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है.
मुखवा- मुखवा गाँव माँ गंगा के शीतकालीन पडाव के रूप में प्रसिद्ध सीमान्त गाँव है जहाँ पर माँ गंगे के पुरोहित निवास करते हें .
गोमुख ग्लेशियर – गंगा का वर्तमान वास्तविक उद्गम स्थल ( जो अब गंगोत्री से लगभग 18 किमी दूर पैदल ट्रेक पर अवस्थित है )
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व-
गंगोत्री पवित्रता, भक्ति और मुक्ति का प्रतीक है। यह हजारों सालों से तीर्थयात्रा का एक प्रमुख केंद्र रहा है और लाखों लोगों में आस्था और श्रद्धा जगाता रहा है।
गंगोत्री और आस-पास में कई सिद्ध महात्मा, साधू और सन्यासी पुरे वर्ष पर्यंत भीषण बर्फ़बारी होने पर भी आध्यात्मिक चिंतन , तपस्या और साधनाओं में लीन रहते हें.
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Declaration…
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श्री ५ मंदिर समिति, गंगोत्री धाम स्थान: गंगोत्री, जिला – उत्तरकाशी, उत्तराखंड.
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श्री ५ मंदिर समिति, गंगोत्रीधाम द्वारा प्राप्त होने वाले प्रत्येक अनुदान/डोनेशन का उपयोग पूर्णरूप से धार्मिक, सामाजिक एवं सेवा कार्यों के उद्देश्य के लिए किया जाता है यथा–
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मंदिर की दैनिक पूजा, भोग एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन
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मंदिर परिसर कीसाफ़–सफाई, मरम्मत एवं रखरखाव
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तीर्थ यात्रियों के लिए सुविधा जैसे आवास, भोजन एवंआवश्यकतानुसार आकस्मिक स्थानीय परिवहन की व्यवस्था
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विशेषपर्व/त्योहारों का आयोजन
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गंगा घाट की साफ़–सफाई औरनिशुल्क चिकित्सा शिविरों का आयोजन
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अन्य धर्मार्थ एवं जनहित के कार्य
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सभी डोनेशन पारदर्शी प्रक्रिया द्वारा स्वीकारे जाते हैं।
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दानदाता की इच्छा अनुसार राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए किया जाएगा (यदि ऐसा निर्देश प्राप्त हुआ हो)।
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डोनेशन प्राप्ति की रसीद जारी की जाएगी, जिसमें दानदाता का नाम, राशि, तिथि एवं प्रयोजन का उल्लेख होगा।
श्री मंदिर ५ समिति, गंगोत्री धाम, हिमालय
श्री ५ मंदिर समिति, गंगोत्री धाम, हिमालय आप सभी तीर्थ यात्रीयों का पवन क्षेत्र श्री गंगोत्री धाम में हार्दिक स्वागत करती है . समिति का मुख्य उद्देश्य धाम में आप सभी श्रद्धालुओं की यात्रा को सरल एवं सुगम बनाना है। समिति विभिन्न स्तर पर अलग -अलग सेवाओं के माध्यम आप सभी की सेवा में तत्पर है . मुख्य घाट और मंदिर में दर्शन के साथ विशेष पूजा पाठ, आस-पास के अन्य धार्मिक स्थलों में धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ का आयोजन , क्षेत्र की अन्य छोटी-छोटी यात्रा, बाबा आनंद- भैरवनाथ के भव्य धाम, भेरवाघाटी में दर्शन और पूजा-पाठ, मां गंगा के शीतकालीन प्रवास श्री मुखीमठ धाम (मुखवा) में यात्रा, दर्शन और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन के लिए समिति द्वारा हर प्रकार की व्यवस्था उपलब्ध है। आप सभी तीर्थयात्रियों से भी निवेदन है कि कृपया यात्रा के नियमों और स्थानीय नियमो का सम्मान करें और इस यात्रा को मंगलमयी बनायें। किसी भी प्रकार की जानकारी या सहायता के लिए मंदिर समिति आपकी सेवा में हर समय उपलब्ध है-
श्री मंदिर ५ समिति, गंगोत्री धाम, हिमालय
प्रबंधन समिति
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